छत्तीसगढ़ में पढ़ना – ‘मन की वजह से बिंद्रा बिना नहीं रहोगे तुम’

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जीवन का आधार क्या है? जिनके कदमों को रेहीस मंदिरी कहा जाता है। चल ले धुरु-धुरु मन एक दुनिया को एक साथ लाता है। ओह वन मोर ला दुलारवत रिथेन। दुनिया को देखो, हमें जीवन दो, बेपर ला नाइते, एक किसान का जीवन पाओ, और तुम अपने भीतर मंथन कर पाओगे।

चलो दिन के लिए चलते हैं
भगे मधे रह रे जीवा ऐसा कहिके ओन्हा कोन्हा ला ज़ंकत रहे। एक नज़र डालें और देखें कि कुछ आत्माएं अपने ही अपमान का सामना कर रही हैं। दिन भर नए बने रहें। ज़ेलत ज़ेलत उमर ला कब था दीही टीला ते कैसे जाने।

एक करोड़ बनेंगे दस एकुंगु
रोटी पोबे ता ओला पूरी- कलठी मरात रहना चाहती थी। नई रोटी रोटी बनी, न कई जन्म लिए। ज़र्गे वहाँ गया, ज़र्गे वहाँ गया। ‘अपनी बात ला जान लव इंगु जान हो जिंगी के पलवा’ के कुछ उदाहरण दीजिए। डंडा ला बने सोजिये धरने र तबे तोला बूढ़ापा मा सहारा मिली। बुढ़ापे की तैयारी करते रहना पड़ा। फिर अपने मन से जाओ, लेकिन फिर भी अपने मन के साथ रहो। ऐसा क्यों हुआ?

वाहू दिन बहुत के हैं
जान सांसो मा पारे रा कान्ही ना कान्ही उदिम मा लगे रह। लगे रहो ते ऐती तेती होती कर नई राही। सावधान रहें, आज आपको पछताना पड़ेगा।

सियान्हा की रड्डा ला धर की रेंडावा
चलवा आज सियान का सियान बनना चाहता था।

(मीर अली मीर छत्तीसगढ़ के विशेषज्ञ हैं, लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं।)

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